नाटो पर रूस के हमले का खतरा कितना वास्तविक है

नाटो पर रूस के हमले का खतरा कितना वास्तविक है

दुनिया इस समय एक बहुत ही खतरनाक मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ मध्य पूर्व में ईरान और इजरायल के बीच तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका ने एक ऐसी चेतावनी दी है जिसने यूरोपीय देशों की नींद उड़ा दी है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का मानना है कि रूस अगले कुछ महीनों में नाटो देशों पर एक बड़ा हमला कर सकता है। यह कोई साधारण बयान नहीं है। यह एक ऐसी आशंका है जो दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर सकती है।

लोग अक्सर सोचते हैं कि रूस केवल यूक्रेन तक सीमित रहेगा। यह सबसे बड़ी भूल है। यूक्रेन युद्ध ने मॉस्को को एक अलग तरह की युद्ध रणनीति सिखा दी है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बावजूद रूस ने अपनी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से सैन्य उत्पादन में झोंक दिया है। उनके कारखाने दिन-रात गोले, बारूद और मिसाइलें बना रहे हैं। अमेरिकी अधिकारियों का साफ कहना है कि ईरान संकट का फायदा उठाकर रूस यूरोपीय सीमाओं पर अपनी आक्रामकता बढ़ा रहा है।

ईरान संकट और रूस की चालाकी

जब पूरी दुनिया का ध्यान मिडल ईस्ट पर लगा होता है, तब रूस अपनी चालें चलता है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ता तनाव पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका के सैन्य संसाधनों को बांट रहा है। वाशिंगटन को अपनी नौसेना और हवाई सुरक्षा प्रणालियों को मध्य पूर्व में तैनात करना पड़ रहा है। रूस इसी मौके की तलाश में था।

रूस और ईरान के बीच सैन्य सहयोग पिछले कुछ समय में बहुत मजबूत हुआ है। ईरान रूस को ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलें दे रहा है। बदले में रूस ईरान को आधुनिक लड़ाकू विमान और हवाई रक्षा प्रणालियां मुहैया करा रहा है। यह केवल दो देशों का गठबंधन नहीं है। यह पश्चिमी प्रभाव को कमजोर करने का एक बड़ा खेल है। जब अमेरिका ईरान को संभालने में व्यस्त होगा, तब नाटो की पूर्वी सीमा पर सुरक्षा ढीली पड़ सकती है। इसी ढील का फायदा उठाकर रूस बाल्टिक देशों या पोलैंड पर दबाव बना सकता है।

बाल्टिक देश क्यों हैं निशाने पर

एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया जैसे छोटे बाल्टिक देश लंबे समय से रूस के निशाने पर रहे हैं। ये तीनों देश नाटो के सदस्य हैं। अगर रूस इनके किसी छोटे हिस्से पर भी नियंत्रण कर लेता है, तो यह नाटो के आर्टिकल 5 को सीधी चुनौती होगी। आर्टिकल 5 कहता है कि एक सदस्य पर हमला सब पर हमला माना जाएगा।

यूक्रेन में व्यस्त होने के बाद भी रूस ने इन देशों की सीमाओं पर अपनी सैन्य गतिविधियां कम नहीं की हैं। अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, रूस ने अपनी पश्चिमी सीमा पर सैनिकों की नई टुकड़ियों का गठन किया है। इन्हें विशेष रूप से आधुनिक हथियारों से लैस किया जा रहा है। अगर मॉस्को को लगता है कि नाटो ईरान संकट के कारण तुरंत जवाबी कार्रवाई नहीं कर पाएगा, तो वह एक दुस्साहस कर सकता है।

नाटो की तैयारी और उसकी कमजोरियां

क्या नाटो इस संभावित हमले के लिए तैयार है? सच कहें तो पूरी तरह नहीं। पिछले कुछ दशकों में यूरोपीय देशों ने अपनी सेनाओं पर खर्च बहुत कम कर दिया था। यूक्रेन युद्ध के बाद स्थिति थोड़ी बदली है, लेकिन सेना को फिर से आधुनिक और विशाल बनाने में सालों का समय लगता है।

जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे बड़े देश अब अपनी रक्षा रणनीति को बदल रहे हैं। उन्होंने रक्षा बजट बढ़ाया है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या हथियारों के स्टॉक की है। यूक्रेन को लगातार हथियार सप्लाई करने के कारण खुद यूरोपीय देशों के भंडार खाली हो चुके हैं। उन्हें भरने में महीनों नहीं, बल्कि सालों लगेंगे। अमेरिकी सेना के जनरलों का मानना है कि रूस इसी सैन्य अंतर का फायदा उठाना चाहता है। रूस जानता है कि उसके पास अभी एक ऐसा मौका है जहां यूरोपीय देश सैन्य रूप से कमजोर स्थिति में हैं।

  • सैन्य साजो-सामान की कमी सबसे बड़ी चुनौती है।
  • सदस्य देशों के बीच राजनीतिक मतभेद फैसले लेने में देरी पैदा करते हैं।
  • वायु रक्षा प्रणालियों की भारी कमी है जो रूसी मिसाइलों को रोक सकें।

खतरे की गंभीरता को देखते हुए नाटो ने अपनी पूर्वी सीमा पर सैनिकों की संख्या बढ़ाई है। 'रैपिड रिएक्शन फोर्स' को हाई अलर्ट पर रखा गया है। इसके बावजूद, जमीन पर असल तैयारी में अभी भी कई कमियां हैं जिन्हें दूर करने में समय लगेगा।

इस संभावित टकराव का भारत पर क्या असर होगा

यह सोचना गलत होगा कि यूरोप की जंग से भारत अछूता रहेगा। अगर रूस और नाटो के बीच सीधा टकराव होता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी। कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है। तेल महंगा होने से देश में महंगाई की एक नई लहर आ सकती है।

इसके अलावा, भारत के रूस के साथ पुराने और मजबूत सैन्य संबंध हैं। हमारी सेना के कई महत्वपूर्ण हथियार रूसी तकनीक पर आधारित हैं। युद्ध की स्थिति में रूस से आने वाले स्पेयर पार्ट्स और हथियारों की सप्लाई पूरी तरह रुक सकती है। भारत के सामने एक बहुत ही कठिन कूटनीतिक स्थिति पैदा हो जाएगी। हमें एक तरफ अपने पुराने दोस्त रूस को संभालना होगा, तो दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को भी बचाना होगा। नई दिल्ली इस समय पूरी स्थिति पर बहुत बारीक नजर रख रही है।

वैश्विक कूटनीति में अब केवल बयानों से काम नहीं चलने वाला। पश्चिमी देशों को यह समझना होगा कि ईरान और रूस के खतरों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू बन चुके हैं। अगर अमेरिका ने समय रहते अपनी रणनीति में बदलाव नहीं किया और नाटो देशों ने अपनी रक्षा तैयारियों को युद्ध स्तर पर नहीं बढ़ाया, तो आने वाले कुछ महीने पूरी दुनिया के लिए बेहद भयावह साबित हो सकते हैं। युद्ध को टालने का एकमात्र तरीका यही है कि नाटो इतनी मजबूत तैयारी दिखाए कि रूस को हमले का विचार ही छोड़ना पड़े।

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Penelope Russell

An enthusiastic storyteller, Penelope Russell captures the human element behind every headline, giving voice to perspectives often overlooked by mainstream media.