अचानक शांत हुआ आसमान और गूंजता हुआ सन्नाटा
अफगानिस्तान के उत्तरी और पूर्वी इलाकों में जब उस दोपहर काली घटाएं घिरीं, तो किसी ने नहीं सोचा था कि यह बारिश जिंदगी का हिसाब लेने आ रही है। मिट्टी के छोटे-छोटे घरों में चूल्हे जल रहे थे। बच्चे आंगनों में खेल रहे थे। फिर अचानक एक गड़गड़ाहट हुई। यह बादलों की आवाज नहीं थी। यह पहाड़ों से टूटकर नीचे गिरते हुए पानी और कीचड़ के उस विशाल सैलाब की आहट थी, जिसने कुछ ही मिनटों में सब कुछ निगल लिया।
तबाही। If you liked this article, you might want to look at: this related article.
बस यही एक शब्द बचता है जब प्रकृति अपना आपा खो देती है। मध्य और उत्तरी अफगानिस्तान के गांवों में आई इस भयानक अचानक बाढ़ ने पलक झपकते ही कम से कम बीस जिंदगियों को छीन लिया। सौ से अधिक लोग अब भी लापता हैं। वे लोग कहां गए? क्या वे कीचड़ की मोटी परतों के नीचे दबे हैं, या फिर उफनती नदियों का पानी उन्हें बहुत दूर बहा ले गया? कोई नहीं जानता।
मान लीजिए अहमद नाम का एक किसान है, जो अपनी पूरी जिंदगी की कमाई से जोड़े दो कमरों के मकान की छत पर खड़ा होकर अपनी आंखों के सामने अपनी गृहस्थी को बहते देख रहा है। अहमद कोई असली चेहरा न भी हो, तो भी यह उस डर को समझने का जरिया है जो इस वक्त अफगानिस्तान के हर उस परिवार के दिल में बैठा है जिसका अपना कोई इस आपदा में खो गया है। For another angle on this development, refer to the latest coverage from The Washington Post.
जब रास्ते गायब हो जाते हैं
बाढ़ सिर्फ पानी का बहना नहीं है। यह किसी सभ्यता के धागों को एक-एक करके तोड़ देना है। इस आपदा में बीस लोगों की मौत की खबर तो महज एक शुरुआती आंकड़ा है। असली भयावहता उस अनिश्चितता में छिपी है जो 100 से ज्यादा लापता लोगों के परिवारों पर बीत रही है।
तलाश शुरू हुई, लेकिन साधन कहां हैं?
वर्षों के संघर्ष और कंगाली से जूझ रहे इस इलाके में राहत और बचाव कार्य किसी पहाड़ को छीलने जैसा मुश्किल काम है। पक्की सड़कें बह चुकी हैं। पुल ताश के पत्तों की तरह ढह गए। टेलीफोन के टावर ठप हो चुके हैं। जिन गांवों का संपर्क बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट चुका है, वहां क्या हो रहा है, इसका सही अंदाजा लगाना भी मुमकिन नहीं।
लोकल प्रशासन और ग्रामीण अपने नंगे हाथों से कीचड़ खोद रहे हैं। कोई फावड़ा चला रहा है, तो कोई महज़ अपने हाथों की उंगलियों से उस मलबे को हटाने की कोशिश कर रहा है जहां कल तक उनका बैठक खाना हुआ करता था।
पानी की रफ्तार इतनी तेज थी कि लोगों को संभलने का एक पल भी नहीं मिला। जो लोग घर के भीतर थे, वे वहीं फंस गए। जो बाहर थे, वे बह गए।
भूखे पेट और भीगे हुए आशियाने
इस त्रासदी का एक और खौफनाक पहलू वह है जो पानी के उतर जाने के बाद शुरू होता है। अफगानिस्तान पहले से ही एक गहरे मानवीय संकट से गुजर रहा है। देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा पहले ही राशन के एक-एक दाने के लिए तरस रहा था। ऐसे में यह अचानक आई बाढ़ उन बची-कुची उम्मीदों पर भी पानी फेर गई।
सैकड़ों बीघे में फैली फसलें तबाह हो चुकी हैं। मवेशी, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं, बह गए। पीने के पानी के कुएं और जल स्रोत गंदे कीचड़ में बदल चुके हैं।
अब सवाल यह नहीं है कि कल क्या होगा। सवाल यह है कि आज की रात ये लोग कहां गुजारेंगे। खुले आसमान के नीचे, भीगी हुई मिट्टी पर, अपनों को खोने का दर्द सीने में दबाए सैकड़ों परिवार बैठे हैं।
पानी जब शांत होता है, तो अपने पीछे बीमारी, महामारी और भूख का एक नया सैलाब छोड़ जाता है। स्वच्छ जल की कमी के कारण हैजा और अन्य जलजनित बीमारियों के फैलने का खतरा सिर पर मंडरा रहा है।
कुदरत का गुस्सा या हमारी लाचारगी?
जलवायु परिवर्तन की बातें जब बड़े-बड़े सम्मेलनों के वातानुकूलित कमरों में होती हैं, तो वे आंकड़े और शब्द लगती हैं। लेकिन अफगानिस्तान के इन सुदूर गांवों में जलवायु परिवर्तन का मतलब है मौत।
यह देश वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में न के बराबर योगदान देता है, लेकिन कुदरत के बदलते मिजाज की सबसे भारी कीमत चुकाने वालों में सबसे आगे खड़ा है। लंबे समय तक सूखा रहने के बाद अचानक होने वाली यह मूसलाधार बारिश इस बात की गवाही देती है कि हमारी धरती का संतुलन किस कदर बिगड़ चुका है।
सूखी, सख्त हो चुकी जमीन पानी को सोखने में असमर्थ होती है। नतीजा यह होता है कि हर बूंद जमीन के ऊपर से बहने लगती है और कुछ ही देर में एक जानलेवा सैलाब बन जाती है।
कीचड़ के नीचे दबे एक खिलौने को देखकर किसी का भी कलेजा कांप सकता है। वह खिलौना किसी ऐसे बच्चे का रहा होगा जो कुछ घंटे पहले हंस रहा था, भाग रहा था। आज उस घर की जगह केवल दलदल है।
लापता लोगों के समय के साथ जीवित मिलने की उम्मीदें धुंधली होती जा रही हैं। फिर भी, मलबे के ढेर पर बैठा एक बूढ़ा बाप आस लगाए बैठा है कि शायद, कहीं से उसका बेटा वापस आ जाए।
सूरज ढल रहा है, कीचड़ सूखकर सख्त हो रहा है, और हवा में सिर्फ अपनों को खो चुके लोगों की खामोश सिसकियां तैर रही हैं।